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देश का पहला धार्मिक सिलेबस उत्तराखंड में तैयार, राष्ट्रवाद-संस्कृति और इतिहास को जगह, जानें खास बातें

सिलेबस में धर्म और धार्मिक मान्यताओं के साथ राष्ट्रवाद, भारतीय इतिहास और संस्कृति को भी शामिल किया गया है, रिपोर्ट- नवीन उनियाल

देहरादून: देश का पहला धार्मिक सिलेबस उत्तराखंड में तैयार हो चुका है. इसमें धर्म और धार्मिक मान्यताओं के साथ राष्ट्रवाद, भारतीय इतिहास और संस्कृति को भी शामिल किया गया है. सिलेबस का प्रारूप तैयार करने के बाद अब शिक्षा विभाग से इसकी मंजूरी का इंतजार है. ऐसा होते ही उत्तराखंड ऐसा सिलेबस तैयार करने वाला पहला राज्य बन जाएगा.

उत्तराखंड में तैयार हुआ देश का पहला धार्मिक सिलेबस: उत्तराखंड में अल्पसंख्यक समाज के बच्चों के लिए धार्मिक शिक्षा का ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया गया है, जिसमें धर्म और धार्मिक मान्यताओं के साथ राष्ट्रवाद, भारतीय इतिहास और संस्कृति की जानकारी भी दी गई है. खास बात यह है कि धार्मिक शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसके लिए परीक्षा आयोजित करने और बच्चों को प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था भी की जा रही है. अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से जुड़े प्राधिकरण की ओर से यह प्रक्रिया संचालित की जाएगी. हालांकि इसके लिए तैयार पाठ्यक्रम को अभी शिक्षा विभाग की मंजूरी मिलनी बाकी है.

धार्मिक शिक्षा में राष्ट्रवाद और इतिहास भी शामिल: इस पाठ्यक्रम में बच्चों को धार्मिक मान्यताओं के साथ भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रवाद से जुड़े विषयों की जानकारी दी जाएगी. देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाली प्रमुख हस्तियों का भी इसमें जिक्र किया गया है. इस तरह धार्मिक शिक्षा के दायरे में धर्म के साथ देश की ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े विषयों को भी शामिल किया गया है.

1 से 8 के बाद 9 से 12वीं तक का धार्मिक शिक्षा पाठ्यक्रम तैयार: उत्तराखंड में कक्षा 1 से 8 तक के लिए धार्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम पहले ही तैयार किया जा चुका है. अब कक्षा 9 से 12 तक के लिए भी पाठ्यक्रम का प्रारूप तैयार कर लिया गया है. इसे शिक्षा विभाग की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा. स्वीकृति मिलने के बाद ही इसे लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी.

परीक्षा के बाद मिलेगा प्रमाण पत्र: धार्मिक शिक्षा से जुड़ी इस पहल में परीक्षा और प्रमाणपत्र की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है. अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से जुड़े प्राधिकरण की ओर से पाठ्यक्रम के आधार पर परीक्षा आयोजित की जाएगी. परीक्षा में शामिल होने वाले बच्चों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रमाण पत्र भी दिए जाएंगे. इस व्यवस्था को धार्मिक शिक्षा के क्षेत्र में नई पहल के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि प्रमाण पत्र किन-किन संस्थानों में मान्य होंगे और उनकी मान्यता से जुड़ी शर्तें क्या होंगी, यह आधिकारिक रूप से स्पष्ट होना बाकी है.

धार्मिक शिक्षा होगी वैकल्पिक: इस व्यवस्था के तहत धार्मिक शिक्षा लेना विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य नहीं होगा. बच्चे अपनी इच्छा से इसका चयन कर सकेंगे. विद्यालयों में नियमित विषयों की पढ़ाई से पहले या उसके बाद धार्मिक शिक्षा देने की व्यवस्था प्रस्तावित है. पाठ्यक्रम को मंजूरी मिलने के बाद इसके क्रियान्वयन, परीक्षा और प्रमाण पत्र जारी करने से जुड़ी व्यवस्थाओं की तस्वीर स्पष्ट होगी.

USMEA चेयरमेन ने क्या कहा: उधर उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Minority Education Authority) के अध्यक्ष प्रो. सुरजीत सिंह गांधी ने बताया कि-

फिलहाल प्राधिकरण को शिक्षा विभाग से इस प्रारूप की मंजूरी का इंतजार है. ऐसा होते ही उत्तराखंड देश में पहला राज्य होगा, जहां धार्मिक शिक्षा के लिए इस तरह पाठ्यक्रम तैयार किया गया है.
-प्रो सुरजीत सिंह गांधी, अध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण-