‘बथौं सुबेरौ घाम-2’ ने बढ़ाया उत्तराखंडी सिनेमा का दायरा, पलायन और पहाड़ की नारी-संघर्ष की कहानी को मिला राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच
संपादकीय डेस्क | RakeshgGB
गढ़वाली सिनेमा की यात्रा केवल मनोरंजन की यात्रा नहीं रही है। यह पहाड़ की भाषा, लोकसंस्कृति, सामाजिक संघर्ष, बदलते गांवों और उन भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का माध्यम भी रही है, जिन्हें मुख्यधारा के बड़े पर्दे पर अक्सर पर्याप्त जगह नहीं मिलती। इसी संदर्भ में ‘बथौं सुबेरौ घाम-2’ एक महत्वपूर्ण फिल्म के रूप में सामने आती है।
फिल्म का निर्माण, निर्देशन और अभिनय उर्मि नेगी ने किया है। फिल्म को उत्तराखंड की आंचलिक सिनेमा की शुरुआती सीक्वेल फिल्मों में गिना गया है और इसकी कहानी मुख्य रूप से पलायन से बदलते पहाड़ी जीवन के इर्द-गिर्द बुनी गई है। 2023 में फिल्म के प्रदर्शन से पहले प्रकाशित रिपोर्टों में इसे ‘सुबेरौ घाम’ की अगली कड़ी बताया गया था।
फिल्म के विषय को समझने के लिए उसके नाम को समझना भी जरूरी है। ‘बथौं’ गढ़वाली संदर्भ में तेज हवा या आंधी के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ऐसे में यह शीर्षक केवल प्राकृतिक घटना का संकेत नहीं देता, बल्कि उन सामाजिक हवाओं का रूपक भी बनता है जो पहाड़ के पारंपरिक जीवन को लगातार बदल रही हैं।
‘बथौं सुबेरौ घाम-2’ ने बढ़ाया उत्तराखंडी सिनेमा का दायरा, पलायन और पहाड़ की नारी-संघर्ष की कहानी को मिला राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच
उत्तराखंडी सिनेमा के लिए ‘बथौं सुबेरौ घाम-2’ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह फिल्म पहाड़ की समस्याओं को केवल स्थानीय मुद्दे के रूप में नहीं देखती, बल्कि उन्हें मानवीय संघर्ष की व्यापक कहानी से जोड़ती है।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक फिल्म की लेखिका, निर्माता और निर्देशक उर्मि नेगी हैं। फिल्म को ‘सुबेरौ घाम’ की अगली कड़ी के तौर पर बनाया गया। 2023 में फिल्म की रिलीज से पहले प्रकाशित रिपोर्ट में इसे उत्तराखंड की आंचलिक भाषा की सीक्वेल फिल्म के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
पहली फिल्म ‘सुबेरौ घाम’ पहाड़ों में शराब की समस्या और उससे प्रभावित परिवारों की कहानी पर केंद्रित थी। इसके बाद ‘बथौं’ में कहानी का फोकस उत्तराखंड के गांवों से होने वाले पलायन और उससे पैदा हुए सामाजिक हालात पर किया गया।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है। पहाड़ में पलायन सिर्फ गांव छोड़ने की घटना नहीं है। इसके साथ खेती, पारंपरिक जीवन, स्थानीय अर्थव्यवस्था, सामाजिक संबंध और अगली पीढ़ी का भविष्य भी जुड़ा हुआ है। जब युवा रोजगार और शिक्षा के लिए शहरों की ओर जाते हैं, तो गांवों में बुजुर्गों और महिलाओं की जिम्मेदारियां बढ़ती हैं। कई जगहों पर घर बंद होते हैं और पारंपरिक सामुदायिक जीवन कमजोर पड़ता है। ‘बथौं’ इसी बदलते सामाजिक परिदृश्य को सिनेमाई कथा में प्रस्तुत करती है।
फिल्म की एक अन्य विशेषता इसका लोकभाषा और लोकसंगीत से जुड़ाव है। फिल्म के संगीत से नरेंद्र सिंह नेगी और प्रीतम भरतवाण जुड़े हैं। फिल्म में मीर रंजन नेगी सहित अन्य कलाकार भी दिखाई देते हैं।
उर्मि नेगी के लिए यह परियोजना केवल अभिनय तक सीमित नहीं रही। वह फिल्म की निर्माता , निर्देशक, पटकथा – कथाकार की भूमिका में भी रही हैं।

फिल्म की अंतरराष्ट्रीय यात्रा का भी उल्लेख प्रकाशित रिपोर्टों में मिलता है। 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित यूरोपियन फिल्म यूनियन गाला में उर्मि नेगी को फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का सम्मान मिला। उसी रिपोर्ट के अनुसार फिल्म दुनिया की लगभग 500 फिल्मों में से अंतिम 15 में शामिल हुई थी।
इसके अलावा, अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार उर्मि नेगी को वर्ष 2023 के दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के क्षेत्रीय फिल्म वर्ग में ‘सुबेरौ घाम-2’ के लिए सम्मानित किया गया था। उसी रिपोर्ट में ‘बथौं’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुने जाने का उल्लेख है।
पौड़ी में फिल्म के प्रदर्शन से जुड़ी 2024 की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि फिल्म को लंदन, थाईलैंड और फ्रांस सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवलों में 24 से अधिक पुरस्कार मिल चुके थे।
फिल्म के आधिकारिक ट्रेलर विवरण में बाद में 36 से अधिक अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल पुरस्कारों का दावा किया गया है। यह संख्या समय के साथ बदल सकती है, इसलिए पुरस्कारों की अंतिम संख्या बताते समय संबंधित आयोजकों या फिल्म की आधिकारिक सूची से ताजा सत्यापन करना उचित होगा।
टोक्यो में दो पुरस्कार मिलने के दावे की स्वतंत्र और विश्वसनीय ऑनलाइन पुष्टि मुझे उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिली। इसलिए हिंदी विंडो की संपादकीय नीति के अनुरूप इसे इस संस्करण में पुष्ट तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। यदि आयोजक की आधिकारिक अवॉर्ड सूची, प्रमाणपत्र या प्रेस रिलीज उपलब्ध हो, तो उस आधार पर इसे अलग से जोड़ा जा सकता है।
कुल मिलाकर, ‘बथौं सुबेरौ घाम-2’ की अहमियत केवल मिले पुरस्कारों की संख्या में नहीं है। इसका वास्तविक महत्व इस बात में है कि एक क्षेत्रीय भाषा की फिल्म ने स्थानीय कथा को स्थानीय भाषा में ही कहने का साहस किया और उस कथा को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाया।
यही वह बिंदु है जहां उत्तराखंडी सिनेमा को केवल ‘क्षेत्रीय सिनेमा’ के रूप में देखने के बजाय भारतीय सिनेमा की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक परंपरा के हिस्से के रूप में समझने की जरूरत दिखाई देती है।
पहाड़ की कहानी जब पहाड़ की भाषा में कही जाती है
सिनेमा सिर्फ कैमरा, अभिनेता और पर्दे का नाम नहीं है। सिनेमा समाज की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का माध्यम भी है।
उत्तराखंड के संदर्भ में यह बात और महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां हिमालय जितना विशाल है, उतनी ही विविध इसकी लोकभाषाएं, लोककथाएं, गीत और जीवन-शैलियां हैं। लेकिन लंबे समय तक इन कथाओं का बड़ा हिस्सा मुख्यधारा के सिनेमाई विमर्श से बाहर रहा।
‘बथौं सुबेरौ घाम-2’ इसी स्थिति के बीच एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करती है।
फिल्म का विषय पलायन है। लेकिन पलायन को केवल आंकड़ों या सरकारी रिपोर्टों की भाषा में समझना और उसे एक परिवार की कहानी के रूप में देखना—इन दोनों में बड़ा अंतर है।
एक रिपोर्ट बता सकती है कि कितने गांवों में आबादी कम हुई। लेकिन एक फिल्म यह दिखा सकती है कि खाली होते घर के भीतर कैसी खामोशी पैदा होती है।
एक आंकड़ा बता सकता है कि कितने युवा रोजगार के लिए शहर गए। लेकिन कहानी यह बता सकती है कि पीछे रह गई मां, पत्नी या बुजुर्ग पिता ने उस अनुपस्थिति को कैसे जिया।
यही सिनेमा की ताकत है।
‘बथौं’ इसी मानवीय पक्ष को सामने लाने का प्रयास करती है।
और शायद यही कारण है कि फिल्म की यात्रा उत्तराखंड की पहाड़ियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों तक पहुंची।
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है—भाषा।
जब कोई कहानी हिंदी या अंग्रेजी में कही जाती है, तो वह व्यापक दर्शक वर्ग तक आसानी से पहुंच सकती है। लेकिन जब वही कहानी गढ़वाली में कही जाती है, तो उसमें स्थानीय जीवन की बारीकियां, संवादों की आत्मीयता और संस्कृति की अपनी ध्वनि बनी रहती है।
गढ़वाली भाषा यहां केवल संवाद का माध्यम नहीं है। यह फिल्म की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है।
इसीलिए नरेंद्र सिंह नेगी और प्रीतम भरतवाण जैसे लोकसंगीत से जुड़े नामों की मौजूदगी महज संगीत तक सीमित नहीं रहती। यह फिल्म के सांस्कृतिक वातावरण को मजबूत करती है। उपलब्ध फिल्म विवरण भी संगीत और लोकसंस्कृति को इसके महत्वपूर्ण हिस्सों के रूप में रेखांकित करते हैं।
इस फिल्म की यात्रा से उत्तराखंडी फिल्म उद्योग के सामने एक बड़ा प्रश्न भी आता है—क्या क्षेत्रीय सिनेमा को केवल पुरस्कारों से आगे बढ़कर स्थायी दर्शक और वितरण व्यवस्था मिल सकती है?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी फिल्म का अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में चुना जाना और उसका अपने ही प्रदेश के दर्शकों तक नियमित रूप से पहुंचना—दो अलग-अलग चुनौतियां हैं।
उत्तराखंड जैसे राज्य में स्थानीय फिल्मों के लिए सिनेमाघरों की उपलब्धता, डिजिटल वितरण, सबटाइटल, ओटीटी प्लेटफॉर्म, सरकारी सहायता, निजी निवेश और स्थानीय दर्शक आधार जैसे विषयों पर व्यापक चर्चा की जरूरत है।
‘बथौं’ जैसी फिल्मों की उपलब्धि तब और अर्थपूर्ण होगी जब इनके अनुभव से आगे की पीढ़ी के फिल्मकारों के लिए रास्ते खुलें।
युवा फिल्मकारों को केवल मुंबई या बड़े शहरों में अवसर तलाशने की जरूरत न पड़े। उत्तराखंड में ही लेखन, शूटिंग, पोस्ट-प्रोडक्शन, साउंड, संगीत और वितरण का मजबूत इकोसिस्टम विकसित हो—यह क्षेत्रीय सिनेमा के लिए दीर्घकालिक आवश्यकता है।
इस संदर्भ में उर्मि नेगी का काम एक व्यक्तिगत फिल्म यात्रा से आगे बढ़कर क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा की संभावनाओं पर चर्चा का आधार बनता है। उपलब्ध स्रोतों में उनके अभिनय, निर्देशन और निर्माण कार्य का उल्लेख मिलता है।
लेकिन इस उपलब्धि को केवल गौरव की खबर बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।
इससे हमें यह पूछना चाहिए कि हम अपनी स्थानीय कहानियों को कितनी गंभीरता से दर्ज कर रहे हैं?
क्योंकि पहाड़ से पलायन केवल लोगों का बाहर जाना नहीं है। इसके साथ कहानियां भी बाहर जा रही हैं। यदि गांव खाली होंगे, तो आने वाली पीढ़ियां उन लोककथाओं, गीतों, बोलियों और जीवन-पद्धतियों को कहां से जानेंगी?
इस दृष्टि से क्षेत्रीय सिनेमा एक प्रकार का सांस्कृतिक दस्तावेज भी बन सकता है।
‘बथौं सुबेरौ घाम-2’ की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि शायद यही है कि उसने पहाड़ की समस्या को पहाड़ की भाषा में कहने की कोशिश की।
और जब ऐसी कहानी दुनिया के दूसरे हिस्सों में दिखाई जाती है, तो वह सिर्फ एक फिल्म की यात्रा नहीं होती—वह एक भूगोल, एक भाषा और एक समाज की आवाज की यात्रा होती है।
संपादकीय निष्कर्ष:
उत्तराखंडी सिनेमा का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि उसे कितने पुरस्कार मिलते हैं। उसका भविष्य इस बात से तय होगा कि क्या वह अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक यथार्थ को लगातार नई पीढ़ी तक पहुंचा पाता है। ‘बथौं’ जैसी फिल्मों ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण जरूर प्रस्तुत किया है।













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