देहरादून का बासमती चावल अपनी गुणवत्ता, महक और स्वाद के कारण दुनियाभर में रखता है अलग पहचान, अब खुद संकट में है बासमती, रिपोर्ट-धीरज सजवाण
देहरादून: बासमती चावल की खेती के लिए देहरादून हमेशा से ही पहचाना जाता रहा है. बासमती सिर्फ एक धान की किस्म नहीं, बल्कि दून घाटी की पुरानी कृषि पहचान का हिस्सा रही है. रायपुर, माजरा, सहसपुर, विकासनगर और डोईवाला जैसे इलाकों में कभी बड़े क्षेत्र में इसकी खेती होती थी. समय के साथ शहर बढ़ा, जमीनों का इस्तेमाल बदला और खेतों की जगह कंक्रीट की कॉलोनियां एवं मकान आते गए. इसका सीधा असर बासमती की खेती पर पड़ा.
देहरादून में सिमटती जा रही बासमती की खेती: उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड की रिपोर्ट की मानें तो देहरादूनी बासमती के क्षेत्रफल में पिछले कुछ सालों में 60 फीसदी से ज्यादा की कमी आई है. आज स्थिति ये है कि रायपुर जैसे इलाके में भी बासमती की खेती करने वाले किसान गिने-चुने रह गए हैं. जिसके चलते अपनी खास मिठास, महक और स्वाद के चलते कभी दून घाटी की पहचान रही बासमती संकट में आ गया है.
देहरादून में करीब तीन दशक से बासमती की खेती कर रहे रायपुर निवासी किसान आशीष राजवंशी बताते हैं कि उनके परिवार ने खेती की जमीन को अब तक बचाकर रखा है. उनके मुताबिक, वर्तमान में वो रायपुर में करीब 5 एकड़ जमीन पर देहरादून बासमती की खेती कर रहे हैं. इसके अलावा विकासनगर और सहसपुर क्षेत्र में करीब 20 से 25 एकड़ में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए बासमती का उत्पादन किया जा रहा है.
इस तरह उनके स्तर पर करीब 30 एकड़ में देहरादून बासमती की खेती हो रही है. आशीष के मुताबिक, उनके परिवार में पिछले 30 से 40 साल से यह खेती चली आ रही है और अब उन्होंने देहरादून बासमती को अपने ब्रांड के जरिए बाजार तक पहुंचाने की कोशिश भी शुरू की है. आशीष बताते हैं कि रायपुर में खेती का रकबा बढ़ाना अब आसान नहीं है. उनका कहना है कि,
अफगान से आयी बासमती देहरादून में क्यों हुई खास? देहरादून की बासमती के इस बदलते सफर को समझने के लिए पुराने किसानों की यादें भी अहम हैं. रायपुर निवासी किसान जय किशोर के मुताबिक, उनके परिवार में करीब 1960 के आसपास से बासमती की खेती होती आ रही है. देहरादून में बासमती के आने को लेकर स्थानीय तौर पर 1839 के आसपास की कहानी बताई जाती है. दून की बासमती का अफगानिस्तान से खास कनेक्शन है. उनका कहना है कि,
पहले बिचौलिए और आढ़तियों की वजह से नहीं मिल पाती थी उचित कीमत: बासमती की खेती सिर्फ जमीन के कम होने की वजह से ही मुश्किल में नहीं आई. किसानों के लिए इसकी खेती को आर्थिक रूप से टिकाऊ रखना भी एक चुनौती रही है. जय किशोर राजवंशी बताते हैं कि पुराने समय में जब किसान अपना धान मंडी तक लेकर जाते थे, तो लागत के मुकाबले उन्हें उतना लाभ नहीं मिल पाता था.

oplus_2
उनके मुताबिक, बिचौलियों और आढ़तियों की भूमिका के कारण किसान को अंतिम कीमत का पूरा फायदा नहीं मिलता था. यही वजह है कि अब कुछ किसान पारंपरिक मंडी व्यवस्था से अलग सीधे ग्राहक तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. वो खुद भी सीधे ग्राहकों तक पहुंचा रहे हैं, या फिर ऑर्गेनिक शॉप के जरिए बिक्री कर रहे हैं. जिससे बढ़िया कीमत मिल रही है. जय किशोर राजवंशी का कहना है कि,
ब्रांडिंग और सीधी बिक्री से किसानों को मिलता है फायदा: आशीष राजवंशी भी किसानों के लिए इसी मॉडल को जरूरी मानते हैं. उनके मुताबिक, सिर्फ खेती करने से किसान की आमदनी सीमित रह जाती है. किसान को अपने उत्पाद की ब्रांडिंग करनी होगी और कोशिश करनी होगी कि उसका उत्पाद सीधे ग्राहक तक पहुंचे. बीच के बिचौलियों को कम करके किसान अपनी आय बढ़ा सकता है. वो खुद देहरादून बासमती को ब्रांड के तौर पर बाजार में बेच रहे हैं. आशीष के मुताबिक,
बासमती का सीमित उत्पादन सबसे बड़ी चुनौती: देहरादून बासमती की एक और बड़ी चुनौती इसका सीमित उत्पादन है. आशीष के मुताबिक, देहरादून में खेती का क्षेत्रफल कम होने की वजह से इतना उत्पादन नहीं हो पाता कि बड़े स्तर पर एक्सपोर्ट मार्केट की जरूरत पूरी की जा सके. विदेशों में बड़े बाजार के लिए लगातार बड़ी मात्रा में एक समान गुणवत्ता वाला उत्पाद चाहिए.
इसके बावजूद उनका कहना है कि वो विदेशों में बैठे ग्राहकों को बी टू सी यानी सीधे बिजनेस-टू-कस्टमर मॉडल (B2C) के जरिए बासमती भेज रहे हैं. आशीष के मुताबिक बड़े स्तर पर एक्सपोर्ट के लिए बासमती का रकबा बढ़ाना जरूरी है. इसके साथ एनओपी यानी राष्ट्रीय जैविक कार्यक्रम (NOP) और एनपीओपी यानी राष्ट्रीय जैविक कार्यक्रम (NPOP) जैसे ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन की जरूरत होती है और यह प्रक्रिया भी लंबी है.
आशीष के अनुसार उनके फार्म को देखने के लिए नीदरलैंड और न्यूजीलैंड से भी लोग आ चुके हैं. उनका दावा है कि विदेशी आगंतुकों ने यहां की जैविक खेती के तरीकों को समझा और स्थानीय तौर-तरीकों को अपने यहां इस्तेमाल करने में रुचि दिखाई. यानी देहरादून बासमती के सामने तस्वीर दो हिस्सों में दिखाई देती है.
जमीन भी कम बची और किसान भी घटे: एक तरफ जमीन लगातार कम हो रही है और दूसरी तरफ जो किसान बचे हैं, वे खेती को नए तरीके से बाजार से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. रायपुर में खेतों के बीच बढ़ती आबादी और निर्माण इस बदलाव को साफ दिखाता है. जहां पहले धान के खेत दिखाई देते थे, वहां अब बड़ी संख्या में आवासीय निर्माण हो चुके हैं.
इसी स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने देहरादून बासमती Type 3 के उत्पादन और संवर्धन के लिए 2026-27 में कार्यक्रम शुरू किया है. विभाग के मुताबिक, इस कार्यक्रम में सहसपुर, डोईवाला, रायपुर और विकासनगर को शामिल किया गया है. कुल 45 गांवों के 160 किसानों को चुना गया है और 75 हेक्टेयर क्षेत्र को कार्यक्रम के तहत लिया गया है. किसानों के लिए 10 प्रशिक्षण और बैठकें आयोजित की गई हैं और एक सीड बैंक भी स्थापित किया गया है.
“कृषि विभाग का फोकस देहरादून बासमती Type 3 की गुणवत्ता बनाए रखते हुए इसके उत्पादन और संवर्धन पर है. धान उत्पादन के लिए एसओपी तैयार की गई है. उसी के मानकों के अनुसार बासमती का उत्पादन कराया जा रहा है. उच्च गुणवत्ता वाले बीज की व्यवस्था भी की गई है. कृषि विभाग के कार्यक्रम में जैविक खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.“- देवेंद्र सिंह राणा, जिला कृषि अधिकारी, देहरादून
कृषि विभाग के दस्तावेज के मुताबिक, एनपीओपी प्रमाणन (NPOP) के लिए उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद से सहयोग लिया जा रहा है. किसानों को हरी खाद के लिए निशुल्क मूंग उपलब्ध कराई गई है और कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के जरिए ग्राम स्तर पर किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया गया है.
विकासनगर में किसानों की ओर से तैयार की गई जैविक खाद से देहरादून बासमती की नर्सरी और जगतपुर, सहसपुर, अंबाड़ी, विकासनगर में बुवाई आदि की जा रही है. यानी सरकारी स्तर पर देहरादून बासमती को सिर्फ बचाने की बात नहीं हो रही, बल्कि चयनित गांवों और किसानों के साथ उत्पादन को आगे बढ़ाने की कोशिश भी की जा रही है, लेकिन असली चुनौती जमीन की है.
क्या सरकार की कोशिशें डाल पाएंगी असर? अगर बासमती के लिए खेत ही लगातार कम होते गए, तो उत्पादन बढ़ाने की सरकारी कोशिश कितनी दूर तक जाएगी, यह बड़ा सवाल है. कृषि विभाग के मौजूदा कार्यक्रम में 75 हेक्टेयर और 160 किसानों को शामिल किया गया है, लेकिन दूसरी तरफ किसान बताते हैं कि दून के शहरी हिस्सों में खेती की जमीन तेजी से कम हुई है.
आशीष राजवंशी जैसे किसान इसी वजह से गांवों की तरफ जा रहे हैं. वो रायपुर की सीमित जमीन में खेती जारी रखते हुए सहसपुर और विकासनगर में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहे हैं. उनका मॉडल बताता है कि देहरादून बासमती को सिर्फ पारंपरिक खेती के रूप में देखने के बजाय इसे ब्रांड, ऑर्गेनिक प्रोडक्ट और सीधे ग्राहक तक पहुंचने वाले कारोबार से भी जोड़ा जा सकता है.
किसान अपनी फसल को सीधे बाजार से जोड़े तो होगा फायदा: आगे आशीष अपने ‘नॉर्थ इंडिया ऑर्गेनिक’ ब्रांड के जरिए उत्तराखंड के दूसरे किसानों के उत्पादों को भी जोड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं. उनका मानना है कि अगर किसान अपनी फसल को सीधे बाजार से जोड़ पाए तो खेती को ज्यादा टिकाऊ बनाया जा सकता है.
शहरीकरण से घटी बासमती की खेती: देहरादून बासमती की कहानी इसलिए भी खास है. क्योंकि, इसमें एक तरफ पुरानी कृषि विरासत है और दूसरी तरफ तेजी से बदलता शहर. पुराने किसान उस दौर को याद करते हैं, जब दून की जमीन पर बासमती के खेत बड़े हिस्से में दिखाई देते थे. आज उन्हीं इलाकों में खेतों के बीच मकान और कॉलोनियां नजर आती हैं.
ऐसे में सवाल सिर्फ ये नहीं है कि देहरादून में बासमती का कितना उत्पादन हो रहा है, बल्कि ये भी है कि क्या शहर के विस्तार के बीच इस पारंपरिक फसल के लिए पर्याप्त खेत बच पाएंगे? कृषि विभाग का 2026-27 का कार्यक्रम फिलहाल 45 गांवों, 160 किसानों और 75 हेक्टेयर क्षेत्र के जरिए इस पहचान को बचाने की कोशिश कर रहा है.
वहीं, किसान अपने स्तर पर जमीन बचाने, गांवों में खेती बढ़ाने और सीधे बाजार तक पहुंच बनाने के रास्ते तलाश रहे हैं. अब आने वाले समय में यह देखना होगा कि सरकारी संरक्षण और किसानों के नए कारोबार मॉडल मिलकर देहरादून बासमती की पुरानी पहचान को कितनी मजबूती दे पाते हैं.
Skip to content












