उत्तराखंड के चमोली जिले में हाल ही में हुए हिमस्खलन ने एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही और जोखिमपूर्ण क्षेत्रों में निर्माण कार्यों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। 28 फरवरी 2025 को माणा गांव के पास सीमा सड़क संगठन (BRO) के कैंप पर हिमस्खलन गिरा, जिसमें 54 मजदूर बर्फ के नीचे दब गए। इनमें से 46 को सुरक्षित निकाला गया, जबकि 8 की मौत हो गई।
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह क्षेत्र पहले से ही हिमस्खलन-प्रवण है, और यहां मजदूरों के अस्थायी आवास बनाना गंभीर लापरवाही का संकेत है। पिछले चार वर्षों में चमोली जिले में BRO के दो कैंप हिमस्खलनों की चपेट में आ चुके हैं। अप्रैल 2021 में नीति घाटी में एक हिमस्खलन ने मजदूरों की बस्ती को नष्ट कर दिया था, जिसमें कई मजदूरों की जान गई थी।
सामाजिक कार्यकर्ता अतुल सती ने आरोप लगाया कि इस क्षेत्र में पहले से हिमस्खलन की चेतावनी दी गई थी, लेकिन प्रशासन ने समय पर कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने कहा, "यदि समय रहते चेतावनी पर ध्यान दिया गया होता, तो इन मजदूरों की जान बचाई जा सकती थी।"
भूगर्भशास्त्री एम.पी.एस. बिष्ट ने भी निर्माण कार्यों को हिमस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में करने को "आपदा को आमंत्रण" बताया है। उन्होंने कहा कि नर पर्वत से बार-बार हिमस्खलन आते हैं, और इस क्षेत्र में निर्माण कार्यों से जोखिम और बढ़ जाता है।
यह घटना उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन और निर्माण कार्यों की योजना बनाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए जोखिमपूर्ण क्षेत्रों में निर्माण कार्यों से पहले विस्तृत भूगर्भीय और पर्यावरणीय अध्ययन आवश्यक हैं।
प्रशासन को चाहिए कि वह हिमस्खलन-प्रवण क्षेत्रों की पहचान कर वहां निर्माण कार्यों पर रोक लगाए और मजदूरों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए।



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