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post authorAdmin 13 Mar 2025

भोलेनाथ संग होली: पारंपरिक होल्यारों की टोली ने मंदिर प्रांगण में रचाया रंगोत्सव.

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में होली का पर्व न केवल रंगों का उत्सव है, बल्कि यह धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक भी है। हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को स्थानीय होल्यारों की टोली भोलेनाथ के मंदिरों में पहुंचकर भगवान शिव के साथ होली खेलने की परंपरा निभाती है।

इस अवसर पर होल्यारों की टोली पारंपरिक वेशभूषा में सज-धज कर ढोल-दमाऊं की थाप पर मंदिर प्रांगण में पहुंचती है। वहां वे भगवान शिव के विग्रह के समक्ष अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं और भक्ति भाव से होली के गीत गाते हैं। इन गीतों में शिव-पार्वती के विवाह, रासलीला और होली के प्रसंगों का वर्णन होता है, जो श्रोताओं को आध्यात्मिक आनंद से भर देता है।

मंदिरों में आयोजित इस होली उत्सव में स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी भी उल्लेखनीय होती है। वे अपने परिवारों के साथ मंदिर में एकत्र होकर होल्यारों की टोली का स्वागत करते हैं और भगवान शिव के साथ होली खेलने की परंपरा में सहभागी बनते हैं। इस अवसर पर मंदिर परिसर रंग-बिरंगे गुलाल से सराबोर हो जाता है और वातावरण भक्ति और उल्लास से गूंज उठता है।

यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करती है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को भी सुदृढ़ करती है। होल्यारों की टोली द्वारा निभाई जाने वाली यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी स्थानीय समुदाय के लिए गर्व और आस्था का विषय है।

इस प्रकार, भोलेनाथ संग होली खेलने की यह परंपरा उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है।