उत्तराखंड में कांग्रेस पार्टी आज जिस सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रही है, वह केवल सत्ता से बाहर होना नहीं, बल्कि नेतृत्व के संकट की दोहरी मार है। पहली पांत के नेताओं की पकड़ कमजोर हो चुकी है और दूसरी पांत अब तक अपना मजबूत आधार नहीं बना पाई है। 2027 विधानसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, लेकिन पार्टी का सांगठनिक ढांचा अभी भी खस्ताहाल स्थिति में है।
राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, कांग्रेस की पहली पंक्ति के नेता पार्टी में अपनी जड़ें बचाने में ही जुटे हैं। दूसरी ओर, युवा और उभरते चेहरों को आगे लाने में संगठन नाकाम रहा है। NSUI और युवा कांग्रेस जैसे सहयोगी संगठन, जो कभी नए नेताओं की नर्सरी माने जाते थे, अब निष्क्रिय और उत्साहहीन हो चुके हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस में दूसरी पंक्ति के नेता पहली पंक्ति के क्षत्रपों की छाया से बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं। सत्ता से लंबे समय से बाहर होने के कारण युवाओं में नेतृत्व की जिम्मेदारी लेने का उत्साह नहीं है। ऐसे में पार्टी में वही पुराने चेहरे प्रत्याशी के तौर पर नजर आ सकते हैं, जिनके नाम पर कई बार चुनाव लड़ा जा चुका है।
पार्टी में नए नेतृत्व का अभाव इतना गंभीर है कि जिन युवाओं को सामने लाया गया, वे अधिकतर परिवारवाद की परंपरा से आए हैं। हालांकि कुछ नेताओं ने इस परंपरा को तोड़कर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें संगठनात्मक मजबूती का सहारा नहीं मिल सका।
प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना का मानना है कि कांग्रेस में नेताओं की कमी नहीं है। उन्होंने कहा, "भाजपा कांग्रेस के मजबूत नेताओं को डरा-धमकाकर तोड़ने में जुटी है, लेकिन कांग्रेस अब भी एकजुट होकर संघर्ष कर रही है।"
फिलहाल, अगर कांग्रेस को उत्तराखंड में सत्ता में वापसी करनी है, तो उसे न सिर्फ जमीनी संगठन को मजबूत करना होगा, बल्कि युवा नेतृत्व को सक्रिय रूप से आगे लाना होगा। वरना आगामी चुनावों में संघर्ष ही उसकी नियति बना रहेगा।



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