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post authorAdmin 23 Nov 2025

कर्नाटक सरकार का महंगा फैसला: 613 करोड़ के स्वीपर किराया विवाद ने बढ़ाई नाराज़गी | पूरी रिपोर्ट.

कर्नाटक कैबिनेट का महंगा फैसला: 7 साल के लिए 613 करोड़ में 46 मैकेनिकल स्वीपर किराए पर, ‘गणित की हत्या’ पर बढ़ा विवाद

कर्नाटक कैबिनेट ने हाल ही में एक बड़े फैसले के तहत 7 वर्षों के लिए 613 करोड़ रुपये में 46 स्व-चालित मैकेनिकल स्वीपर मशीनों को किराए पर लेने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी। इस निर्णय ने बेंगलुरु में नाराजगी बढ़ा दी है, क्योंकि कई विशेषज्ञों और नागरिकों का मानना है कि इन मशीनों को खरीदना किराए पर लेने की तुलना में कहीं अधिक किफायती साबित होता।

तकनीकी समिति की रिपोर्ट में किराये का विरोध

तीन सदस्यीय तकनीकी समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद विवाद और बढ़ गया। समिति ने अपनी सिफारिश में साफ कहा था कि:

  1. मशीनों को खरीदना और उनका संचालन करना

  2. मशीनें खरीदकर संचालन को आउटसोर्स करना

  3. या फिर मशीनों को किराए पर लेना

इन तीन विकल्पों में सबसे बेहतर विकल्प सीधा खरीद है, क्योंकि इससे:

  • मशीनों पर बेहतर नियंत्रण रहता

  • संचालन में लचीलापन मिलता

  • लागत के लिहाज़ से भी यह दीर्घकालिक रूप से सस्ता पड़ता

समिति ने साफ कहा कि किराया मॉडल अंतिम विकल्प होना चाहिए और इससे:

  • मशीनों की तकनीकी विशिष्टताओं

  • प्रत्येक वाहन की वास्तविक कार्यक्षमता
    की निगरानी मुश्किल होगी।

GBA ने खरीद के बजाय किराए पर लेने को क्यों चुना?

इसके बावजूद, GBA के मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में हुई बैठक में अलग राय सामने आई।

Boston Consulting Group (BCG) ने रिपोर्ट में कहा:

  • मशीनें खरीदने में बहुत अधिक प्रारंभिक पूंजी लगेगी

  • GBA के पास सीमित मानव संसाधन हैं

  • भविष्य में मशीनों में संशोधन या सेवा अपग्रेड करना कठिन होगा

  • सरकारी स्वामित्व वाली मशीनों का O&M अक्सर ठेकेदारों द्वारा अनियमित तरीके से किया जाता है

  • KPIs लागू कराने में प्रशासन को अधिक जोखिम रहता है

BCG के अनुसार, किराया मॉडल में KPIs लागू करना आसान होगा और सरकार को एकमुश्त पूंजीगत बोझ नहीं उठाना पड़ेगा

हालाँकि, बैठक में यह भी माना गया कि लंबी अवधि में किराए की लागत मशीन खरीदने से ज्यादा हो सकती है।

सरकार ने किराये के मॉडल को क्यों सही ठहराया?

सरकार द्वारा जारी आदेश में कहा गया है:

  • 7 वर्षों तक खरीद + O&M

  • 7 वर्षों तक किराया मॉडल

दोनों के शुद्ध वर्तमान मूल्य (NPV) में बहुत बड़ा अंतर नहीं है।

इसके साथ तुलना के लिए अन्य शहरों की दरें भी दी गईं:

शहर किराया (प्रति किमी)
पटना ₹946
पुणे ₹1,432
मोहाली ₹1,118
भुवनेश्वर ₹1,210
बेंगलुरु ₹894

इस आधार पर सरकार ने इसे उचित और प्रबंधनीय वित्तीय मॉडल बताया।

विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल

सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दलों ने जमकर हमला बोला।

BJP का आरोप

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने कहा:

  • GBA के पास पहले से 26 मैकेनिकल स्वीपर मौजूद हैं, जो इस्तेमाल नहीं हो रहे

  • इसके बावजूद कांग्रेस सरकार 613 करोड़ खर्च करके 46 और मशीनें किराए पर लेना चाहती है

  • यह फैसला अनावश्यक और अपव्ययी है

उन्होंने तंज कसते हुए कहा:
"कांग्रेस बेंगलुरु की सड़कों पर झाड़ू लगाकर भी पैसा कमाना चाहती है।"

JDS का हमला—'गणित की हत्या'

जेडीएस नेता निखिल गौड़ा ने कहा:

  • बाजार में ये मशीनें ₹1.13 करोड़ से ₹3 करोड़ में उपलब्ध हैं

  • लेकिन GBA इन्हें ₹1.9 करोड़ प्रति वर्ष की दर से किराए पर लेना चाहता है

  • यह फैसला “दिन दहाड़े गणित की हत्या” है