विदेश की धरती पर रहकर भी अपने गांव, पहाड़ और समाज के लिए निरंतर समर्पण-यही पहचान है कनाडा निवासी प्रवासी समाजसेवी विनोद गुसांई और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती पूर्बा गुसांई की।
महासरनाग देवता की पावन भूमि, बिशन गांव (न्याय पंचायत थाती, बूढ़ाकेदार) में जन्मे विनोद गुसांई एक साधारण किसान परिवार से हैं। पिता स्वर्गीय कलम सिंह गुसांई और माता श्रीमती डब्बली देवी के संस्कारों में पले-बढ़े विनोद जी का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षों से भरा रहा। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में बिशन से थाती और फिर विनयखाल तक शिक्षा के लिए प्रतिदिन की यात्रा उनके आत्मबल की परीक्षा थी।
आर्थिक मजबूरियों के कारण पढ़ाई अधूरी रह गई और रोजगार की तलाश उन्हें मुंबई ले गई, जहां वर्षों तक संघर्ष और श्रम ही उनकी पहचान बना। 1996 में विवाह के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ जीवन की नई यात्रा शुरू हुई। वर्ष 2000 में मस्कट जाना हुआ, परंतु स्वास्थ्य कारणों से वापसी करनी पड़ी। इसके बाद दिल्ली, जर्मनी और अंततः कनाडा—जहां निरंतर परिश्रम और पारिवारिक सहयोग से उन्हें स्थिरता मिली।
सेवा-संकल्प नहीं, जीवन-दर्शन
बचपन की कठिनाइयों ने विनोद जी के भीतर सेवा-भाव को स्थायी संकल्प में बदल दिया। उनका स्पष्ट सिद्धांत है-कमाई का एक हिस्सा समाज के लिए।
कोरोना काल में स्वयं परिवार के कोविड प्रभावित होने के बावजूद, गोंगढ़ व थाती-बूढ़ाकेदार क्षेत्र में सैकड़ों परिवारों तक राशन सामग्री पहुंचाई।
जुलाई 2024 की आपदा के दौरान कनाडा से ही राहत टीम गठित कर गांव-गांव राशन, बिस्तर और कपड़े वितरित कराए।
उत्तरकाशी (धराली), चमोली सहित प्रदेश के अन्य आपदा-प्रभावित क्षेत्रों और जरूरतमंद प्रवासी परिवारों की भी लगातार सहायता की।
परिवार-सेवा की असली शक्ति
इस सेवा-यात्रा में श्रीमती पूर्बा गुसांई और बच्चों का साथ उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उच्च शिक्षा, विदेश में व्यस्त जीवन और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद समाजसेवा को प्राथमिकता देना इस परिवार को विशिष्ट बनाता है।
विश्वास और प्रेरणा
आपदा के कठिन दिनों में समयांतराल और व्यस्तताओं के बावजूद विनोद जी रोज़ घंटों संपर्क में रहकर जरूरतमंद परिवारों की सूची, वितरण और निगरानी सुनिश्चित करते रहे। उनका विश्वास है—
“अपने साथ दान-पुण्य के सिवा कुछ नहीं जाता।”
निष्कर्ष
विदेश में रहकर भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना और विपत्ति में समाज के साथ खड़ा होना—यही सच्ची सफलता और सच्ची देशभक्ति है। विनोद गुसांई और पूर्बा गुसांई जैसे प्रवासी समाजसेवी आज के समय में प्रेरणा का जीवंत उदाहरण हैं।



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