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post authorAdmin 14 Jan 2026

न्यायाधीशों और न्यायिक अफसरों के खिलाफ शिकायतों की सूचना ‘गोपनीय’ बताकर नहीं रोकी जा सकती.

उत्तराखंड में सूचना के अधिकार और न्यायिक पारदर्शिता से जुड़ा एक अहम फैसला सामने आया है। न्यायाधीशों और अधीनस्थ न्यायपालिका के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज शिकायतों से जुड़ी जानकारी को केवल “गोपनीय” बताकर रोका नहीं जा सकता।
यह निर्णय उत्तराखंड सूचना आयोग की ओर से सुनाया गया है।

मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी ने कहा कि जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है और यह सिद्धांत न्यायपालिका पर भी समान रूप से लागू होता है

यह फैसला आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की द्वितीय अपील पर सुनाया गया। आयोग ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेकर एक माह के भीतर आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी न्यायाधीश या अधिकारी की व्यक्तिगत पहचान सार्वजनिक नहीं की जाएगी।

संजीव चतुर्वेदी ने आरटीआई के तहत 1 जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 के बीच उत्तराखंड की अधीनस्थ न्यायपालिका से संबंधित कई बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी। इसमें न्यायिक अधिकारियों पर लागू सेवा नियम, शिकायतों की संख्या, उन पर हुई अनुशासनात्मक या आपराधिक कार्रवाई और संबंधित प्रक्रियाओं से जुड़े दस्तावेज शामिल थे।

इससे पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय के लोक सूचना अधिकारी ने शिकायतों को संवेदनशील और गोपनीय बताते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया था। लेकिन सूचना आयोग ने स्पष्ट कहा कि केवल गोपनीयता का हवाला देकर सार्वजनिक हित से जुड़ी जानकारी रोकी नहीं जा सकती।