वरिष्ठ रंगकर्मी एवं गढ़वाली रंगमंच के अनुभवी कलाकार मनमोहन उप्रेती का शुक्रवार को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से गढ़वाली रंगमंच, लोक-संस्कृति और रंगकर्म जगत को गहरा आघात पहुँचा है।
दिल्ली जैसे महानगर में, जहाँ हर दिन अनेक घटनाएँ घटती हैं, वहाँ किसी कलाकार का जाना सामान्य समाचार लग सकता है, लेकिन मनमोहन उप्रेती का जाना एक संवेदनशील, समर्पित और आत्मानुशासित रंगकर्मी के अवसान के रूप में देखा जा रहा है। सत्तर और अस्सी के दशक में उन्होंने रंगमंच पर अपने प्रभावशाली अभिनय से एक अलग पहचान बनाई।
उन्होंने रंगमंच की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, बल्कि जीवन के अनुभव, निरंतर अभ्यास और मंच के प्रति गहरी प्रतिबद्धता से इस कला को आत्मसात किया। पारिवारिक जिम्मेदारियों और जीवन की व्यस्तताओं के कारण वे कुछ समय तक मंच से दूर रहे, लेकिन उनके भीतर का कलाकार कभी निष्क्रिय नहीं हुआ।
वर्ष 2025 में उन्होंने रंगमंच पर सशक्त वापसी करते हुए ‘द हाई हिलर्स’ संस्था द्वारा मंचित, डॉ. सतीश कलेश्वरी लिखित नाटक ‘मधु मंडाण’ में एलटीजी सभागार, आईटीओ, दिल्ली में प्रभावशाली अभिनय किया, जिसे दर्शकों और रंगकर्मियों ने समान रूप से सराहा।
अपने शांत, विनम्र और सौम्य स्वभाव के लिए पहचाने जाने वाले मनमोहन उप्रेती पारिवारिक जीवन में भी अत्यंत जिम्मेदार थे। वे अपने पिता स्वर्गीय बालकिशन उप्रेती के साथ वर्षों तक पंचकुईयां मार्ग स्थित अंधमहाविद्यालय परिसर में पारिवारिक बुक-बाइंडिंग कार्य में सक्रिय रहे।
गढ़वाली रंगमंच से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ उन्होंने मंच साझा किया और अपने मित्र, वरिष्ठ रंगकर्मी सुरेश नौटियाल से उनकी विशेष आत्मीयता रही। उनके छोटे भाई बृजमोहन उप्रेती द्वारा उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 16 जनवरी की रात उन्होंने जीवन की अनंत यात्रा की ओर प्रस्थान किया।
उनके परिवार में पत्नी, बच्चे, भाई-बहन एवं विस्तृत परिजन हैं।



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