देहरादून।
उत्तराखंड में पहाड़ी कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के उद्देश्य से माल्टा का महीना अभियान के अंतर्गत सिट्रस आर्थिकी पर एक महत्वपूर्ण विमर्श दून लाइब्रेरी में आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम हरेला गाँव धाद की पहल पर हुआ, जिसमें कृषि, विपणन और अकादमिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने माल्टा सहित संतरा प्रजाति के फलों की संभावनाओं और चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम के स्वागत संबोधन में हरेला उद्यान के संयोजक पवन बिष्ट ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से निरंतर चल रहा माल्टा का महीना अभियान इस वर्ष निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने कहा कि अभियान अब समाज से लेकर शासन तक प्रभावी पहचान बना चुका है। इस वर्ष अभियान के तहत लगभग 12 टन माल्टा की खरीद के लिए जन-सहभागिता को प्रेरित किया गया।
नर्सरी और पौध सामग्री सबसे बड़ी चुनौती
संवाद सत्र में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि सिट्रस उत्पादन की सबसे बड़ी समस्या प्रमाणिक, उन्नत और रोगमुक्त पौध सामग्री की कमी है। वर्तमान में न तो सरकारी और न ही निजी स्तर पर संतरा प्रजाति का सुदृढ़ जीन बैंक स्थापित हो पाया है। इसके अभाव में किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौधे नहीं मिल पा रहे हैं।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि क्षेत्र पंचायत स्तर पर नर्सरी, खरीद एवं विपणन केंद्र, तथा उन्नत पौधशालाओं की स्थापना की जानी चाहिए। साथ ही माल्टा, नारंगी, कागजी नींबू, गल-गल (हिल लेमन) और चकोतरा जैसे फलों को इको-टूरिज्म से जोड़कर ग्राम स्तर पर स्वरोजगार के नए केंद्र विकसित किए जा सकते हैं।
सिट्रस उत्पादन में 50–60% तक गिरावट
गढ़वाल विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार राज्य में सिट्रस फलों के क्षेत्रफल और उत्पादन में 50 से 60 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। इसके पीछे रोगमुक्त पौध सामग्री की कमी, वैज्ञानिक नर्सरी प्रणाली का अभाव, न्यूनतम समर्थन मूल्य का लागत से कम होना, सुनिश्चित खरीद व्यवस्था का न होना, तथा प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन और ब्रांडिंग ढांचे की कमी जैसे कारण हैं।
MSP, खरीद तंत्र और ब्रांडिंग पर जोर
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि माल्टा का न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत से ऊपर (20–25 रुपये प्रति किलो) तय किया जाना चाहिए। साथ ही सरकारी व सहकारी खरीद तंत्र, किसान समूह आधारित एकत्रीकरण और बड़े शहरी बाजारों से सीधा संपर्क स्थापित करना आवश्यक है।
माल्टा को मिले अलग पहचान
कृषि विपणन विशेषज्ञों ने कहा कि माल्टा को कीनू और अन्य संतरा प्रजाति से अलग पहचान दिलाने के लिए पैकेजिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग पर विशेष ध्यान देना होगा। चूंकि माल्टा का उत्पादन अभी सीमित मात्रा में है, इसलिए स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से इसे संगठित कर बाजार तक पहुंचाया जाना चाहिए।
कार्यक्रम में यह भी सर्वसम्मति से कहा गया कि माल्टा राज्य के कई पर्वतीय क्षेत्रों में उत्पादित होता है, इसलिए इसे उत्तराखंड का स्टेट फ्रूट घोषित किया जाना चाहिए।



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