दुनिया इस समय एक बड़े आर्थिक बदलाव के दौर से गुजर रही है। बीते कुछ वर्षों में जिस रफ्तार से देशों ने सोना खरीदा है, उसने वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह नहीं है कि सोना महंगा क्यों हो रहा है, बल्कि सवाल यह है कि दुनिया को डॉलर पर भरोसा क्यों कम होता जा रहा है?
दरअसल, रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा रूस के लगभग 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज करने की कार्रवाई ने कई देशों को झकझोर कर रख दिया। यह पहली बार था जब डॉलर को खुले तौर पर एक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया।
इस घटना के बाद चीन, भारत, तुर्किये और खाड़ी देशों जैसे कई राष्ट्रों ने अपने-अपने स्तर पर यह आकलन करना शुरू किया कि अगर भविष्य में अमेरिका से राजनीतिक या रणनीतिक टकराव हुआ, तो क्या उनके डॉलर-आधारित रिजर्व भी खतरे में पड़ सकते हैं?
यही कारण है कि अब दुनिया के सेंट्रल बैंक डॉलर के बजाय सोने की ओर लौट रहे हैं।
चीन के पास फिलहाल करीब 2303 टन, जबकि भारत के पास लगभग 880 टन सोना रिजर्व में है। यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि बदलते वैश्विक भरोसे का संकेत हैं।



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