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post authorAdmin 03 Feb 2026

देहरादून में हिमालयी भूस्खलन जोखिम पर अंतरराष्ट्रीय मंथन, सुरक्षित विकास पर वैज्ञानिकों का फोकस.

देहरादून में हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन जोखिम और सुरक्षित विकास की चुनौती को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहन मंथन शुरू हो गया है। उत्तराखण्ड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र द्वारा हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में आपदा-सक्षम विकास विषय पर पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।

यह कार्यक्रम 02 से 06 फरवरी 2026 तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण एवं वित्तीय प्रशासन अनुसंधान संस्थान, सुद्धोवाला में आयोजित हो रहा है। उद्घाटन सत्र में आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने कहा कि हिमालय भूगर्भीय रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है, जहां भूस्खलन, अतिवृष्टि और भूकंपीय गतिविधियां लगातार खतरा पैदा कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण का उद्देश्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भूस्खलन की प्रक्रिया और जोखिम को समझना, सुरक्षित व टिकाऊ अवसंरचना विकसित करना और सड़कों, पुलों तथा जलापूर्ति जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए दीर्घकालिक, लचीले इंजीनियरिंग समाधान अपनाना है। साथ ही विभागों की तकनीकी क्षमता बढ़ाकर जोखिम आकलन और आपदा-पश्चात पुनर्बहाली को अधिक प्रभावी बनाना भी लक्ष्य है।

कार्यक्रम में नॉर्वे के भू-तकनीकी अनुसंधान संस्थान के विशेषज्ञ हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप ढलान स्थिरता, मृदा सुदृढ़ीकरण, सॉइल नेलिंग, जल-निकासी उपायों और उपग्रह आधारित जोखिम मानचित्रण पर प्रशिक्षण दे रहे हैं। भूस्खलन विशेषज्ञ डॉ. हाकोन हेयर्डल ने कहा कि हिमालय जैसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बदलते भूस्खलन पैटर्न को देखते हुए वैज्ञानिक अध्ययन, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद जरूरी है।

इस अवसर पर विश्व बैंक के प्रतिनिधि अनुप करण्थ ने बताया कि वर्ष 2013 की आपदा के बाद से उत्तराखण्ड में आपदा जोखिम न्यूनीकरण, पुनर्बहाली और संस्थागत क्षमता निर्माण के लिए निरंतर सहयोग किया जा रहा है।

प्रशिक्षण के अंतर्गत प्रतिभागियों ने हरिद्वार स्थित मनसा देवी भूस्खलन क्षेत्र का क्षेत्रीय भ्रमण कर वास्तविक परिस्थितियों में जोखिम विश्लेषण, न्यूनीकरण उपायों और स्थानीय स्तर पर प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियों का व्यावहारिक अध्ययन किया।