रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड) से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने पूरे पहाड़ को झकझोर कर रख दिया है। अपने ही आंगन में खेलते मासूम को खो देना किसी भी मां के लिए सबसे बड़ा दुःस्वप्न होता है। लेकिन रुद्रप्रयाग जनपद के एक छोटे से गांव में यह दुःस्वप्न हकीकत बन गया।
न्याय पंचायत सारी के सिन्द्रवाणी गांव में रहने वाली बबीता की जिंदगी एक ही पल में उजड़ गई, जब उनका पांच साल का इकलौता बेटा दक्ष गुलदार का शिकार बन गया। जिस आंगन में कुछ दिन पहले तक बच्चे की किलकारियां गूंजती थीं, आज वहां खामोशी पसरी हुई है। घर के बाहर सांत्वना देने वालों की भीड़ है, लेकिन भीतर ऐसा दर्द है, जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल है।
बबीता के पति चार साल पहले रोज़गार की तलाश में मुंबई गए थे, लेकिन फिर कभी वापस नहीं लौटे। न कोई खबर, न कोई सहारा। तब से बबीता ही अपने बूढ़े सास-ससुर और तीन बच्चों की जिम्मेदारी अकेले उठाए हुए थीं। उनकी बड़ी बेटी कीर्तिका नौ साल की है और छोटी बेटी काव्या छह साल की। दोनों बहनें अब भी समझने की कोशिश कर रही हैं कि भाई कहां चला गया और मां हर वक्त क्यों रो रही है।
टूटा-फूटा मकान, दीवारों में दरारें, गोशाला तक पर छत नहीं—इन हालात में भी बबीता ने कभी हार नहीं मानी। जंगल से घास काटना, मजदूरी करना और जैसे-तैसे परिवार का पेट पालना उनकी दिनचर्या थी। लेकिन बेटे की मौत ने उनकी हिम्मत भी तोड़ दी है।
बबीता बार-बार यही सवाल कर रही हैं—“मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था, जिसकी सजा मेरे मासूम को मिली?” अब वह अपने दुख से ज्यादा अपनी बेटियों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। गांव में पसरा सन्नाटा सिर्फ एक बच्चे की मौत की कहानी नहीं कहता, बल्कि यह उस मां की उजड़ती दुनिया का गवाह है, जो अब प्रशासन और सरकार से मदद की उम्मीद लगाए बैठी है।




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