उत्तर भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी सामने आई है। आईआईटी रुड़की द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते भू-स्खलन और बाढ़ के खतरे को लेकर बड़ा अलर्ट जारी किया गया है।
यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल International Journal of Climatology में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के अनुसार, हिमालयी मौसम प्रणाली को नियंत्रित करने वाले ‘पश्चिमी विक्षोभ’ के व्यवहार में मौलिक और संरचनात्मक बदलाव देखे जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पारंपरिक रूप से सर्दियों में हिमपात लाने वाले पश्चिमी विक्षोभ अब प्री-मानसून काल यानी मार्च से मई के दौरान भी अधिक सक्रिय हो रहे हैं। इससे हिमालयी राज्यों में अचानक बाढ़, क्लाउडबर्स्ट और भू-स्खलन की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है।
तेजी से बदल रहा मौसम चक्र
आईआईटी रुड़की के जल विज्ञान विभाग के प्रो. अंकित अग्रवाल के अनुसार, मौसम चक्र में हो रहे बदलाव भविष्य में जल संसाधनों की उपलब्धता को भी प्रभावित कर सकते हैं।
इसी दिशा में जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के वैज्ञानिक भी पहले ‘सीजन शिफ्टिंग’ की ओर संकेत कर चुके हैं।
क्या हैं प्रमुख बदलाव?
पश्चिमी विक्षोभों के मार्ग में बदलाव
तीव्रता में वृद्धि
प्री-मानसून अवधि में सक्रियता
संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में फ्लैश फ्लड और लैंडस्लाइड का बढ़ता जोखिम
अध्ययन में 2023 में हिमाचल प्रदेश और 2025 में उत्तराखंड में आई बाढ़ जैसी चरम घटनाओं को इन वायुमंडलीय परिवर्तनों से जोड़ा गया है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मौजूदा आपदा पूर्वानुमान मॉडल अब पर्याप्त नहीं हैं। आपदा प्रबंधन रणनीतियों की तत्काल समीक्षा और अद्यतन आवश्यक है।



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