नैनीताल।
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने (IPC धारा 306) के एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सत्र अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि “संदेह चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता।”
यह फैसला जस्टिस आशीष नैथानी की एकल पीठ ने सुनाया। अदालत ने अपीलकर्ता सुनील दत्त पाठक को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
क्या था मामला?
यह मामला वर्ष 2004 में खटीमा (जिला उधम सिंह नगर) में हुई एक आत्महत्या से जुड़ा है।
15 सितंबर 2004 को आरोपी की पत्नी ने अपने मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या या बाहरी चोट के कोई संकेत नहीं मिले थे।
मृतका के परिजनों ने आरोप लगाया कि पति को पत्नी के चरित्र पर संदेह था और वह उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता था। इसी मानसिक दबाव के कारण उसने आत्महत्या की।
सत्र अदालत का फैसला
उधमसिंह नगर की सत्र अदालत ने आरोपी को दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषी ठहराते हुए:
7 वर्ष का सश्रम कारावास
10,000 रुपये का जुर्माना
की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट का निर्णय
हाई कोर्ट में अपील दायर करते हुए आरोपी पक्ष ने तर्क दिया कि:
आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे का कोई प्रमाण नहीं है।
कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ।
वैवाहिक विवाद या संदेह को स्वतः ‘उकसावा’ नहीं माना जा सकता।
सभी तथ्यों और साक्ष्यों की समीक्षा के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष उकसावे को साबित करने में विफल रहा।
इसी आधार पर सत्र अदालत का फैसला रद्द कर आरोपी को बरी कर दिया गया।



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