उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में कार्यरत अतिथि शिक्षकों के सामने अब गंभीर रोजगार संकट खड़ा हो गया है। पहले से ही वेतन कटौती की मार झेल रहे इन शिक्षकों पर अब नौकरी जाने का खतरा मंडराने लगा है।
दरअसल, शिक्षा विभाग में हाल ही में प्राइमरी और जूनियर स्कूलों के 32 शिक्षकों को एलटी सहायक अध्यापक के पद पर पदोन्नति दी गई है। विभागीय नियमों के अनुसार किसी पद पर स्थायी नियुक्ति या प्रमोशन होने के बाद वहां कार्यरत अतिथि शिक्षक की सेवा स्वतः समाप्त मानी जाती है। इसी नियम के चलते गढ़वाल मंडल में कार्यरत 32 अतिथि शिक्षकों की नौकरी पर संकट खड़ा हो गया है।
इस स्थिति को लेकर अतिथि शिक्षक संघ ने सरकार के सामने अपनी चिंता व्यक्त की है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष राजेश धामी, महामंत्री राजपाल रावत और कोषाध्यक्ष रमेश रमोला ने देहरादून में विभागीय अधिकारियों से मुलाकात कर समस्या रखी है। संघ के प्रतिनिधि शिक्षा मंत्री से भी मुलाकात का समय मांग रहे हैं, लेकिन मंत्री के पश्चिम बंगाल में व्यस्त होने के कारण अभी तक मुलाकात संभव नहीं हो पाई है।
अतिथि शिक्षक संघ का कहना है कि सरकार ने पहले इन पदों को यथावत रखने का आश्वासन दिया था। इसलिए प्रभावित शिक्षकों को अन्य रिक्त पदों पर समायोजित किया जाना चाहिए।
वेतन कटौती से बढ़ी आर्थिक परेशानी
अतिथि शिक्षकों का आरोप है कि उन्होंने सर्दियों की छुट्टियों के दौरान भी स्कूलों में कार्य किया था और इसके प्रमाण भी विभाग को सौंपे थे। इसके बावजूद जनवरी के वेतन से छुट्टियों के दिनों का भुगतान काट लिया गया।
शिक्षकों का कहना है कि पहले ही सीमित वेतन मिलता है और उस पर भी कटौती कर दी गई। इससे कई शिक्षकों के सामने परिवार के भरण-पोषण का संकट खड़ा हो गया है।
भविष्य को लेकर बढ़ा मानसिक तनाव
अतिथि शिक्षक संघ का कहना है कि आर्थिक तंगी और नौकरी की अनिश्चितता के कारण हजारों शिक्षक मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार जल्द कोई ठोस नीति नहीं बनाती है तो उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा।
टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ चार अप्रैल को दिल्ली कूच
इधर बेसिक शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्यता के विरोध में चार अप्रैल को दिल्ली में बड़ा प्रदर्शन प्रस्तावित है। उत्तराखंड से भी बड़ी संख्या में प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूल शिक्षक इसमें भाग लेने जा रहे हैं।
प्रदेशीय जूनियर हाईस्कूल शिक्षक संघ के मंडलीय सचिव सैन सिंह नेगी का कहना है कि एक सितंबर 2025 को आए न्यायालय के फैसले से देश के करीब 25 लाख शिक्षक प्रभावित हुए हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार ने जल्द समाधान नहीं निकाला तो शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।



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