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post authorAdmin 05 Apr 2026

पहाड़ों का न्यायालय: उत्तराखंड का कोटगाड़ी माता मंदिर, जहां अर्जी लगाते ही मिलता है न्याय.

उत्तराखंड की देवभूमि में आस्था और न्याय की एक अनोखी परंपरा सदियों से चली आ रही है। यहां पिथौरागढ़ जिले के पांखू क्षेत्र में स्थित कोटगाड़ी माता मंदिर को पहाड़ों का न्यायालय कहा जाता है। मान्यता है कि यहां मां के दरबार में अर्जी लगाने वाला व्यक्ति कभी निराश नहीं लौटता।

चैत्र और अश्विन मास के नवरात्रों में पूरे देश में देवी पूजा की परंपरा रही है। इन दिनों लोग उपवास रखकर और मां की आराधना कर मन की शुद्धता और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करते हैं। उत्तराखंड में इन नवरात्रों का एक विशेष महत्व भी है, क्योंकि यहां मां को न्याय की देवी के रूप में भी पूजा जाता है।

पिथौरागढ़ जिले का पांखू क्षेत्र स्थित कोटगाड़ी माता मंदिर सती पार्वती के अंगों से बने 52 सिद्धपीठों में से एक माना जाता है। स्थानीय लोग मां को कोकिला माता के नाम से भी जानते हैं। यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं बल्कि न्याय की उम्मीद का भी प्रतीक बन चुका है।

यहां एक विशेष परंपरा है। यदि किसी व्यक्ति को जीवन में अन्याय का सामना करना पड़ रहा हो, तो वह अपनी समस्या को कागज पर लिखकर मां के चरणों में अर्पित कर सकता है। यह अर्जी स्टांप पेपर पर भी लिखी जा सकती है या साधारण कागज पर भी। मंदिर के पुजारी उस अर्जी को पढ़कर मां के चरणों में समर्पित कर देते हैं।

माना जाता है कि मां के दरबार में सच्चे मन से लगाई गई अर्जी का न्याय अवश्य मिलता है। भूमि विवाद, पारिवारिक कलह या जीवन की अन्य परेशानियों से पीड़ित लोग यहां आकर अपनी व्यथा मां को सुनाते हैं। इतना ही नहीं, डाक के माध्यम से भी अपनी अर्जी यहां भेजी जा सकती है।

कोटगाड़ी माता मंदिर को कई लोग पहाड़ों का “सुप्रीम कोर्ट” भी कहते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, जिन महिलाओं को संतान सुख नहीं मिल पाता, वे यदि रात में दीपक लेकर मां की पूजा करें तो उनकी मनोकामना पूरी हो सकती है। मंदिर परिसर में ऐसी कई प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो हाथों में दीपक लिए अर्चना करती महिलाओं का प्रतीक हैं।

नवरात्र और दशहरे के अवसर पर यहां विशेष पूजा होती है। देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं।

प्राचीन समय में यहां मनौती पूरी होने पर बलि देने की परंपरा थी, जिसे अब बंद कर दिया गया है। मां को भगवती के वैष्णवी स्वरूप में पूजा जाता है और उन्हें खीर का भोग लगाया जाता है। मंदिर परिसर में बागदेव के रूप में सूरजमल और छुरमल नामक दो भाइयों के मंदिर भी स्थित हैं।

माना जाता है कि यह मंदिर चंद राजाओं के समय में स्थापित किया गया था। मंदिर के सामने बना धूना आज भी निरंतर प्रज्वलित रहता है।

कोटगाड़ी माता मंदिर तक पहुंचने के लिए डीडीहाट और बेरीनाग के बीच स्थित थल के पास पांखू तक सड़क मार्ग उपलब्ध है। हल्द्वानी और देहरादून से यहां तक आने के लिए परिवहन की सुविधा भी उपलब्ध है। हालांकि रात्रि विश्राम की व्यवस्था सीमित है, इसलिए श्रद्धालुओं को अपनी तैयारी के साथ यहां आना बेहतर माना जाता है।

देवभूमि उत्तराखंड में स्थित यह मंदिर आज भी लोगों के लिए आस्था, विश्वास और न्याय का अनूठा संगम बना हुआ है।

Kotgari Devi - Pithoragarh | Kotgari Devi Photos, Sightseeing